रात को पुल से देखता हूँ मैं , दूर तक फैली धार
संगम की , दूर दुनिया के किसी हिस्से में , तुम
जो इस वक़्त चुपचाप
सो गयीं होंगी , अब तलक आ के मिल के
बहती हो , गँगा-जमना की धार में घुल कर ,
ज़िन्दगी कुम्भ है मेरी हरपल , हर तरफ
बिजलियाँ है,हलचल है , कितने ही शोरदार मेले
हैं , पर मेरी 'लुप्त शारदा' अब तक , मुझ में छोड़े
थे जो कभी तूने , सरगमी मौन वो अकेले हैं.....!
No comments:
Post a Comment